नमस्कार ।
आज फिर से श्री कृष्ण की एक अद्भुत कहानी लेकर उपस्थित हूं।
श्री कृष्ण को लोग न जाने कितने नामो से पुकारते है कोई कृष्ण कहता है , कोई गोपाल , कोई मधुसूदन , कोई पालनहार और कोई माधव । न जाने कितने रूप और कितने नाम परंतु ये क्या आपको लोग "रणछोड़" के नाम भी बुलाते है और ये नाम कितना अद्भुत है ओह।
इसके पीछे भी बहुत ही सुंदर वृतांत है आइए जानते है क्यों ? आप सबको पता है कान्हा को यदि ये नाम मिला है तो उसमे भी उनकी ही मर्जी होगी ।
एक बार मगध के राजा जयचंद ने श्री कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था परंतु अपने साथ यवन देश के राजा कालयवन को अपने साथ मिला लिया था ।
भगवान शिव ने कालयवन को वरदान दिया था कि कोई भी चंद्रवंशी और सूर्यवंशी उसे हरा नहीं सकता है । कोई शस्त्र और बल उससे पराजित नहीं कर सकती अतः वो अपने को अजय और अमर समझने लगा था ।
श्री कृष्ण उसके इस वरदान के बारे में जानते थे उनको पता था कि उनका सुदर्शन चक्र भी उसका(कालयवन ) का कुछ नही बिगड़ सकता है अतः वो युद्ध छोड़ का भागने लगे उनको युद्ध भूमि से भागते देख जराशंघ उन पर हंसने लगा और उधर कालयवन श्री कृष्ण के पीछे पीछे भाग रहा था और कहे जा रहा था कि लोग श्री कृष्ण को "रणछोड़" बोलकर बुलायेगे क्युकिं वो युद्ध भूमि छोड़े कर भाग रहे है परंतु श्री कृष्ण इसकी बातों को ध्यान नहीं दिया और एक पुरानी गुफा के अंदर चले गए ।
इस गुफा में राजा मुकचुंद त्रेतायुग में असुरों से युद्ध कर बहुत थक गए थे अतः राजा इंद्र के कहने पर वो सो गए थे । भगवान इंद्र ने उनको ये वरदान दिया था की यदि कोई मानुष उन्हें नींद से जगाएगा तो वो उनकी आंखो से निकलने वाले अग्नि से भस्म हो जाएगा ।
श्रीकृष्ण ये बात जानते थे अतः गुफा में प्रवेश करते ही उन्होंने अपना पीतांबर राजा मुकचुंद के उपर डाल दिया और छुप गए ।
कालयवन भी उनके पीछे पीछे गुफा के अंदर आ गया । उसे लगा श्री कृष्ण उनसे डर कर सो गए है अतः कालयवन ने लात मारकर श्री कृष्ण को उठाने की कोशिश की ।
राजा मुकचुंद की निंद्रा भंग हुई और उनके आखों से निकलने वाले अग्नि से राजा कालयवन भस्म हो गए और मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्री कृष्ण तो अंतर्यामी है उन्हें तो सब पता है किस की मृत्यु किस तरह से लिखी जा चुकी है । श्री कृष्ण पर हंसना बहुत आसान है और उनको "रणछोड़" कह कर पुकारना भी ।
श्री कृष्णा जो सृस्टि करता है वो युद्ध के मैदान से भाग रहे है ये भले ही एक क्षण के लिए अद्भुत प्रतीत लग हो परन्तु उनकी माया को समझना आसान भी तो नहीं है।
चेहरे पर औलोकिक मुस्कान , सबको को मोह लेने की छवि , मंत्रमुग्ध करने की क्षमता वाले श्री कृष्णा का स्मरण मात्र ही बहुत है।
महाभारत के युद्ध में जब दानवीर कर्ण का प्रसंग चल रहा था तब भी श्री कृष्णा , जो अर्जुन के सारथि थे युद्ध के मैदान से भाग रहे थे और दानवीर कर्ण श्री कृष्णा के पीछे पीछे भाग रहे थे।
अर्जुन ने श्री कृष्णा से पूछा कि आप युद्ध भूमि क्यों छोड़े कर भाग रहे है तो श्री कृष्ण मुस्कराते हुए कहा कि पार्थ तुम्हे पता नहीं मुझे लोग "रणछोड़" के नाम से बुलाते है।
इस दौरान कर्ण का रथ का पहिया गड्ढे में फंस गया और जब कर्ण अपने रथ का पहिया गड्ढे से निकलने के लिए नीचे आया तभी श्री कृष्ण ने अर्जुन से दानवीर कर्ण पर वाण चलाने को कहा और कर्ण मृत्यु से पहले श्री कृष्ण के विराट स्वरुप के दर्शन प्राप्त कर मोक्ष का अधिकारी हुए ।
श्री कृष्णा की भक्ति में ही शक्ति है उन्होंने हमें जीवन जीना सिखाया है परन्तु एक सामान्य मनुष्य होकर हम हर बात को उनकी नहीं समझ सकते है। हाँ एक मार्ग है भक्ति का। जहां आपके मन में उठ रहे सवालों का उत्तर प्राप्त होगा।
जब आप इस विश्वास के साथ भक्तिमय होंगें कि यदि श्री कृष्ण ने कहा है या किया है सब सही है उनकी ही मर्जी है, उनका ही आशीर्वाद है तभी आपका मार्ग सही होता चला जायेगा और एक समय आप अपने को "श्री कृष्ण" में समर्पित पायेंगें।
इसलिए कहते रहिये राधे कृष्णा , राधे कृष्णा , राधे कृष्णा।
उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।
धन्यवाद
Happy Beginning...
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