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बाल कृष्ण के दर्शन करने भगवान शिव धरती पर पधारे ।

बाल कृष्ण के दर्शन करने भगवान शिव धरती पर  पधारे ।

प्रिय पाठक ,

नमस्कार ।
            



आज फिर से कृष्ण की भक्ति में मन रमने की बात करूंगी । इतना सुंदर चित्रण है कि आपका मन उन दृश्यों को अपने मन से नही भुला सकता है ।

श्री कृष्ण का जन्म हो चुका है और मां यशोदा के ममतामई आंचल में उनका लालन पालन हो रहा था ।

एक दिन कैलाश पर्वत पर आसान जमाए भगवान भोले बाबा को श्री कृष्ण के बाल स्वरूप को देखने की मन में इच्छा हुई ।

सबसे अद्भुत बात तो ये कि दोनो ही देव पालनकर्ता श्री कृष्ण और संहार कर्ता शिवजी दोनो एक दूसरे को अपना इष्ट मानते थे ।
दोनों ही एक दूसरे के अनन्य भक्त । मन में शिवजी की अपने भगवान के बाल स्वरूप के दर्शन करने की इच्छा हुई और वो धरती पर अवतरित हो गए ।

भोले बाबा ने एक साधु का रूप धारण किया । भोले बाबा का अद्भुत रूप , बड़ी दाढ़ी , चेहरे पर विभूति और गले में माला और कमंडल शुसोभित था ।

भोले बाबा सीधे नंद बाबा के घर के सामने पहुंच गए और भिक्षा के लिए आवाज लगाना लगे ।

शिवजी नंदबाबा के द्वार पर आया देख कान्हा जी मुस्कुराने लगे । शिवजी ने कहा ये क्या प्रभु मैं आपके दर्शन के लिए आया हूं और आप अपने बाल स्वरूप के दर्शन देने में इतना विलंब क्यों कर रहे है तो कान्हा जी कहते है कि मेरा बाल स्वरूप तो माता यशोदा के अधीन है अतः आपको तो माता यशोदा की ही आज्ञा लेनी होगी ।

उन्होंने बहुत बार भिक्षा के लिए आवाज लगाई परंतु किसी ने आवाज नही सुनी ।उस वक्त यशोदा मां कान्हा जी का नहलाने के बाद शृंगार कर रहीं थी ।

बार बार भोले बाबा भिक्षा के लिए पुकार रहे थे तभी एक गोपी को उनकी पुकार सुनाई दी । गोपी ने शिवजी से कहा शायद यहां कोई नहीं चलिए मैं आपको भिक्षा देती हूं परंतु भोले बाबा ने कहा कि वो जिस द्वार पर एक बार भिक्षा मांगते है वहां यदि न मिले तो वो बिना भिकाच लिए वापस लौट जाते है ।

गोपी ने कहा नहीं बाबा हमारे गोकुल से कोई भी साधु खाली हाथ नहीं लौटा है और ये कह गोपी नंद के महल चली में गई । गोपी ने साधु के आने की बात मां यशोदा को बतलाई और मां यशोदा ने खाने का बहुत सारा सामान और कुछ रत्न भी साधु को देने के लिए बाहर आ गई ।

यशोदा ने साधु की आवाज न सुनने के लिए क्षमा मांगी और कहा की वो अपने लल्ले का शृंगार कर रही थी ।

भोले बाबा ने कहा की वो भी मां यशोदा के लाल का दर्शन करना चाहते है परंतु यशोदा इस बात के लिए बिलकुल राजी नहीं हुई क्योंकि भोले बाबा के वस्त्र और आभूषण से वो डर गई थीं और वो जानती थी कि बहुत बार उनके कान्हा को क्षति पहुंचाने की कोशिश हो चुकी है ।

बार बार भोले बाबा कान्हा जी कि दर्शन करने की जिद्द करने लगे तो मां यशोदा ने कड़े शब्दों में शिवजी से कहा कि यदि आप भिक्षा लेना चाहते है तो लीजिए नही तो आप प्रस्थान करें ।

बोले बाबा ने उनको समझने के लिए कहा कि वो बहुत दूर कैलाश से आए है उसपर मां यशोदा ने कहा कि यदि वो कैलाश से आए है और जाकर भोले बाबा के दर्शन कर ले यहां क्या करने आए है ।

उन्होंने शिवजी को भोजन और रत्न देने की बात की तो शिवजी ने कहा ये भोजन और रत्न मेरे लिए मिट्टी के समान है लो मैं ही आपको हीरे और जवाहरात देता हूँ और इतना कहकर शिवजी ने अपने कमंडल से हीरा , कीमती रत्न और जवाहरात यशोदा मां के थाल में डाल दिया । ये देखा की यशोदा और गोपी आश्चर्य से एक दूसरे को देखने लगी ।

अंदर कान्हा जी ये सब देख रहे थे वो समझ गए कि माता उनकी किसी भी तरह से नही मानेगी अतः उन्होंने योगमाया से आग्रह किया कि वो मां याशोदा को मनाए और आप सबको ये बता दे कि योग माया कान्हा जी के जन्म से ही गोकुल में निवास कर रही थी और काफ़ी वृद्ध थी ।

योगमाया वहां आई और शिवजी को प्रणाम किया और यशोदा मां को समझते हुए कही कि वो इन साधु को जानती है जब वो कैलाश लगी थी तब इनसे मिली थी।

उन्होंने कान्हा को लाने को कहा और बोला कि जा यशोदा लाला को दर्शन के लिए ले आ ।यशोदा मां घर के अंदर गई और कान्हा जी से बोली चल लाला कोई साधु तेरे दर्शन को आया है ।

यशोदा मां जैसे ही कान्हा जी को लेकर बाहर आई दोनो भक्त और भगवान एक दूसरे के दर्शन किए । दोनों शिव और विष्णु का अंतरमन एक दूसरे को देख रहे थे , आनंदित हो रहे थे और उनकी खुश की सीमा नहीं थी ।

शिवजी कान्हा जी के बाल स्वरूप के दर्शन पाकर अपने को धान्य समझ रहे थे उनके मन में कान्हा को आलिंगन करने की इच्छा हुई वो प्रभु को छूना चाहते थे और उन्होंने मां यशोदा से कहा देवी में आपके लाला को अपने गोद में लेना चाहता हूं परंतु मां यशोदा ने सीधे से मना कर दिया है ।

अतः शिवजी ने अपने प्रतिरूप से कान्हा जी को गले लगाया और फिर वहां से अंतर्ध्यान हो गए ।
इस तरह से भक्त और भगवन ने के दूसरे के दर्शन किए । अद्भुत दृष्ट दोनो ही शक्तिशाली परंतु दोनो ही विनम्र ।

कान्हा जी का बाल स्वरूप के दर्शन के लिए शिव जी ये भक्ति उत्कृष्ट है ।

वैसे कान्हा तो है ही ऐसे क्या भक्त और क्या भगवान सब उनके मनमोहक रूप के दर्शन के लिए आतुर रहते है । उनकी छवि इतनी सुंदर जो मन मोह ले । मन हमेशा उनके दर्शन को चाहता है । धान्य है वो गोकुल के लोग जिनको कान्हा का प्रतियक्ष दर्शन प्राप्त हुआ ।


आज भी मन में विश्वास है कि है एक मार्ग भक्ति का है जो कान्हा जी तक पहुंचता है ।
यदि हमारी भक्ति में शक्ति है , निष्ठा है, प्रेम है तो कान्हा का साथ भी हमेशा हम जब के साथ है ।


एक भक्ति गाना है जरूर सुनिए

राधे गोविंदा मन भज ले हरि का प्यारा नाम है ।
गोपाला हरि का प्यारा नाम , नंदलाला हरि का प्यारा नाम ।


चलिए कान्हा का ध्यान करते जाइए और गुनगुनाते जाइए
राधे कृष्ण, राधे कृष्ण और राधे कृष्ण।

उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।


धन्यवाद
Happy Beginning...


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सबसे महत्वपूर्ण:-

1) रत्न के द्वारा उपाय
2) उपाय दान स्वरूप उन ग्रहों का जो आपके कुंडली के लये शुभ नही है।( *** कभी भी अच्छे ग्रह का दान नही करना चाहिए)
3) पूजा- पाठ  उन ग्रहों का जो आपके लिए अच्छे तो  परंतु आपके कुंडली मे कमजोर है ।
4) उपाय जो आपके जीवन में अनुकूल परिवर्तन लाये ।
5) कलर थेरपी, आचार- विचार या व्यवहार द्वारा, खान- पान द्वारा उपाय जाने ।


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