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हे कृष्ण :- दोस्ती कैसे निभाते है ये आप से सीखेंगे। Happy Friendship Day

प्रिय पाठक ,

नमस्कार।  



आज फिर से एक बहुत ही मनोरम कथा की बात करूंगी।  आज कृष्णा की भक्ति की नहीं श्री कृष्णा के दोस्ती निभाने के कथा की बात करुँगी।  दोस्ती  कैसे निभाते है ये श्री कृष्ण से सीखेंगे।  

फ्रेंडशिप डे (Happy Friendship Day) पर श्री कृष्ण की दोस्ती एक सुदामा के साथ और एक द्रौपदी के साथ की कहानी जानेगें।  

भगवान कृष्ण और द्रोपदी बहुत ही अच्छे मित्र थे । द्रौपदी श्री कृष्ण को सखा मानती थी और श्री कृष्ण सखी बुलाते थे ।

श्री कृष्ण द्रौपदी का साथ हमेशा देते थे और अपनी दोस्ती निभाते थे।

कौरवों ने धोखे से जुए में पांडवों को हरा दिया था और उन्हें 12 वर्ष का वनवास काटना पड़ा था ।
द्रौपदी ने सूर्य भगवान की तपस्या की थी और सूर्य भगवान ने खुश होकर द्रौपदी को "अक्षय पात्र" दिया था ।
अक्षय पात्र एक ऐसा पात्र था जिसमे खाना कभी खत्म नहीं होता था जबतक द्रोपदी खाना नही खा लेती थी ।

एक दिन की बात है पांडव और द्रौपदी सभी ने भोजन समाप्त ही किया था कि उनको समाचार प्राप्त हुआ की मुनि दुर्वासा अपने 12 शिष्यों के साथ पधार रहे है ।
सभी लोग परेशान हो गए क्युकिं दुर्वासा मुनि के गुस्से से सभी परिचित थे और सब को मालूम था कि यदि उनके स्वागत में कमी हो गई तो उनके श्राप का भागी होना पड़ेगा ।

दुर्वासा मुनि आ गए जहां पांडव टहरे हुए थे सभी ने उनको नमन किया । दुर्वासा मुनि ने कहा कि वो भोजन से पहले पास में नदी है वहां स्नान करना चाहते हैं और फिर आकर भोजन करेंगे ।

द्रौपदी बहुत परेशान थी । अक्षय पात्र खाली था क्योंकि द्रोपदी ने भी खाना खा लिया था । इस मुसीबत की घड़ी में द्रौपदी ने अपने मित्र श्री कृष्ण को याद किया और अपने वादे के मुताबिक श्री कृष्ण वहां पहुंच गए । द्रौपदी ने अपनी व्यथा बताई ।

श्री कृष्ण ने कहा कि अक्षय पात्र ले आओ । द्रौपदी अक्षय पात्र ले कर आई तो कान्हा जी ने देखा चावल का एक दाना पात्र में पड़ा था । श्री कृष्ण ने वो एक चावल का दान को खा लिए और उन्होंने द्रौपदी को कहा की उनका पेट भर गया है।

इधर दुर्वासा मुनि और उनके शिष्यों ने भी ये अनुभव किया की उनका भी पेट भर चुका है ।
उन्हें समझ नही आ रहा था कि ऐसा कैसे हुआ । फिर वो पांडवों और द्रौपदी को आशीर्वाद दिए और बिना कुछ खाए पिए वहां से चले गए ।

अब द्रौपदी को भी ये समझ में नहीं आ रहा था ऐसा कैसे हो गया । उसने द्रौपदी ने श्री कृष्ण से कहा ,
तो कृष्ण कहते है कि मैं ही ब्रामण्ड हूं और जब मेरा पेट ही भर गया तो सबका पेट भी स्वतः भर जायेगा ।

इस तरह से श्री कृष्ण ने अपनी दोस्ती निभाई थी । श्री कृष्णा ने हमें ज्ञान दिया की दोस्त वही जो विकट समय में साथ दे।


और एक प्रसंग के अनुसार सबसे लोकप्रिय और परिचित कथा श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता की चर्चा करूंगी ।
कृष्ण और सुदामा बचपन में बहुत ही अच्छे मित्र थे । दोनो एक साथ खेले और बड़े हुए । सुदामा बहुत गरीब थे परंतु श्री कृष्ण के नजर में कोई अन्य बातें महत्वपूर्ण नहीं थी ।

धीरे धीरे समय व्यतीत हुआ और कालांतर में श्री कृष्ण द्वारका के राजा हुए ।
श्री कृष्ण और सुदामा के बीच बड़ा अंतर आ गया था कहां श्री कृष्ण राजा थे और कहां सुदामा के गरीब ब्राह्मण जो भिक्छा मांग कर अपना जीवन यापन करते थे ।

एक दिन सुदामा की पत्नी ने कहा कि आप तो कहते है कि द्वारकाधीस श्री कृष्ण आपके मित्र है तो आप उनके पास जाए और अपने लिए सहायता मांग लाइए ।

सुदामा राजी हो गए और उनकी पत्नी ने दो मुट्ठी चूड़ा उपहार स्वरूप देने को दिया ।

जब श्री कृष्ण को सुदामा के द्वारका पधारने की बात सुनी तो वो बहुत खुश हुए और खुद ही सुदामा के स्वागत के लिए दौड़ पड़े ।

श्री कृष्ण सुदामा को अपने गले से लगा लिया और सुदामा को अपने महल ले आए ।

श्री कृष्ण सुदामा के दैन्य स्थिति को देख कर सब समझ चुके थे फिर भी कृष्ण ने उपहार के बारे में पूछा और सुदामा ने सुख चूड़ा की पोटली कृष्ण के तरफ बड़ा दी । श्री कृष्ण ने प्रेम से वो सुखा चूड़ा खाया और अपने मित्र की खूब आदर सत्कार किया ।
श्री कृष्ण के आखों से आसूं रुकने का नाम ही नही ले रही थी ।

सुदामा अपने मित्र से कुछ भी नही मांग पाए और दूसरे दिन वो वापस अपने नगरी लौट आए ।
सुदामा ने देखा कि उसकी कुटिया महल में परिवर्तित हो चुकी है । पूरा घर धन्य धन से भरा था । उसकी पत्नी बहुत ही सुंदर वस्त्र पहने हुए बाहर आई और इस चमत्कार के बारे में बताया ।
अब सुदामा के अश्रुधारा की बारी थी जो अब सुधमा का कहना नहीं मान रही थी । सुदामा ने श्री कृष्ण को धन्यवाद किया ।
ये है श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता । निश्चल और प्रेम पूर्ण जहां सिर्फ अटूट प्रेम की खुशबू की अनुभूति होती है ।

और इस तरह से श्री कृष्णा ने फिर से अपनी दोस्ती निभाई थी। ऐसी दोस्ती जो अनमोल थी

शायद दोस्ती शब्द के सही मायने हमें तो श्रीकृष्णा ने बहुत पहले से ही बतला दिया है।  
जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं होगा जहाँ श्री कृष्णा की उपदेश का प्रभाव का अहसास नहीं हो।  

कृष्ण आपने आप में सम्पूर्ण शब्द हैं । उनकी लीला और महिमा अद्भुद है । हम सब तो बस उनकी व्याख्या ही कर सकते है ।
कितना भी सोच लीजिए श्री कृष्ण के बारे में उतना ही कम लगता है ।
कितनी भी भक्ति कर लो वो कम लगता है ऐसा मानो प्रतीत होता है अथाह सागर से एक बूंद ही मिल पाया है ।
श्री कृष्ण का मनोरम छवि आखों का आनंद पहुंचती है और अंतरमन को सुकून ।
और ऐसा अनुभव होता है जैसे मन बोल रहा हो " कृष्ण कृष्ण कृष्ण रटे आत्म मेरी "


इसलिए कहते रहिए राधे कृष्ण राधे कृष्ण राधे कृष्ण।

धन्यवाद





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