श्रीकृष्ण से प्रेम राधा रानी करती थी या रुकमणि जी।
प्रिय पाठक,
नमस्कार।
एक बार कि बात है श्री कृष्ण बहुत ही बीमार हो गये थे ठीक ही नही हो रहे थे बहुत सारे वैध ने उनका इलाज किया परंतु किसी को भी उनकी बीमारी समझ में ही नही आ रही थी कि भगवान श्री कृष्ण को क्या हो गया है।
फिर अंत में एक अनुभवी वैध काफी जाँच करने के बाद इस नतीजे पर पहुँचे कि जो भी स्त्री श्री कृष्ण से प्रेम करती है यदि श्रीकृष्ण उनका चरणामृत को ग्रहण करें तभी श्री कृष्ण स्वस्थ हो सकते थे।
चारों तरफ ये बात आग की तरह फैल चुकीं थी ये बात श्री कृष्ण की पत्नी रुकमणि जी को भी बताई गयी। रुकमणि जी श्री कृष्ण से प्रेम तो बहुत करती थी परंतु अपने पति श्री कृष्ण को चरणामृत का पान करवाना पत्नी धर्म के विरुद्ध था और इतना ही नहीं ये नरक का भागी भी बना रहा था।
जहाँ पत्नी अपने पैर से पति को स्पर्श करना भी पाप समझती थी और आज भी है वहाँ पर पति को चरणामृत (अपने चरण धोकर पानी पिलाने की बात हो रही थी) देना किसी भी पत्नी के लिये इतना भी सहज नही था।
उपर से स्त्री जिनको पति स्वरूप भी मानती है उनके साथ इस तरह का व्यवहार करने से वो जन्म जन्म के लिए नरक की भागी होंगी ।
श्री कृष्ण की तबियत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी और अब तो सभी गोपियाँ जो कृष्ण से अथाह प्रेम करती है उनका रो रो कर बुरा हाल हुए जा रहा था।
चलते चलते ये बात राधा रानी के पास पहुँच गयी। उनको ज्ञात हुआ कि श्री बहुत बीमार है और जो भी स्त्री उनसे अटुट प्रेम करती है उनको अपने चरणामृत का पान या यू कहु की अपने चरण कमल को पानी से धोना है और वो पानी श्री कृष्ण पियेगें।
राधा रानी का प्रेम अलौकिक था परंतु ये बातें उनके भी मन को तार तार कर चुकी थी उनके भी अंतर आत्मा इस बात को स्वीकार नही कर पा रही थी परंतु उनके प्रेम का स्तर की कोई सीमा नहीं थी उनके प्रेम को शायद ही कोई परिभाषित ही कर पाया हो।
उनका स्नेह और प्रेम कान्हा के प्रति सर्व श्रेष्ठ है। उनका प्रेम लोक परलोक, पाप पुण्य, स्वर्ग नरक से भी उच्च था। इसी प्रेम के प्रवाह के कारण राधा रानी ने तुरंत ही निर्णय लिया कि वो कान्हा जी को अपने चरणामृत का पान करवाई।
राधे रानी वहां पहुंची जहाँ श्री कृष्ण सो रहे थे उन्होंने वैध के कहने पर अपने चरण को जल से धोकर कान्हा को ग्रहण करने को दिया ।
चरणामृत पीते ही धीरे धीरे श्री कृष्ण स्वस्थ हो गए। जब श्री कृष्ण को इस बात का पता चला तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
क्या कान्हा ये बता रहें थे कि इंसान का कर्म सर्वोपरि होता है और तभी वो पूजनीय भी होता है।
क्या ये कारण भी हो सकता है ?? कान्हा तेरी बातें तू ही जाने।
इस तरह से राधा रानी ने अपनी प्रवाह किये बैगर, अपने जन्म और मरण, पाप और पुण्य, स्वर्ग और नरक की चिंता किये बैगर कान्हा के प्राण जायदा महत्वपूर्ण लेगें।
उनके निःस्वार्थ प्रेम को देख यही कहा जा सकता है कि उनका प्रेम सर्वोपरि था। जहाँ किसी भी डर का स्थान ना था।
न ही सामाजिक बंधन था और न ही स्वर्ग और नरक का भय।
वैसे भी हम सभी जानते है कि राधा रानी और श्री कृष्ण जन्म जन्म एक दूसरे के लिए है उन दोनों ने जगत को प्रेम का ज्ञान देने के लिए ही पृथवी पर अवतरित हुए थे।
राधा रानी का ये प्रेम अलौकिक था, निः स्वार्थ और समर्पित था।
सबसे महत्वपूर्ण ये है कि हमारे श्री कृष्ण जो भी करते है उसका कोई न कोई कारण या उद्देश्य जरूर होता है।
कान्हा की कार्य को समझना इतना आसान भी नहीं है हाँ इतना यकीन है कि उनका कोई भी कार्य हो या लीला हमेशा हमारे लिए कोई न कोई परेशानी का हल लेकर आती है या फिर शिक्षा या ज्ञान जो हमारे अंतर ज्ञान को बढ़ाने में सहायता करती है।
वैसे कान्हा की भक्ति में जो आनंद है न उतना कहीं है भी नहीं। तो क्यों न उनकी भक्ति करते जाए और उनका नाम लेते जाये।
कान्हा की लीला कान्हा ही जाने।
राधे कृष्णा, राधे कृष्णा, राधे कृष्णा।
उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।
धन्यवाद
Happy Beginning...
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