प्रिय पाठक
नमस्कार
मैं आचार्या सांत्वना दत्ता आज फिर से एक अच्छे विषय की जानकारी साझा करुँगी। आज मैं जनम कुंडली के बारे में चर्चा करुँगी।
ज्योतिष शास्त्र में आकाश को 12 भाव मे बांटा गया है ।आकाश के नक्शे को जन्म पत्रिका कहते है ।
और इस जन्म पत्रिका के भी 12 भाग ही हुए है और इसे हम भाव कहते है ।
आकाश के 360 अंश के भचक्र के 12 भाग करने पर प्रत्येक भाव 30 अंश का होगा । और इन भावों को प्रथम , द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्टम, सप्तम, अष्टम, नवमं, दशम, एकादश, द्वादश भाव के नाम से जानते है ।
प्रथम भाव(1) , चतुर्थ भाव(4) , सप्तम(7) भाव एवं दशम(10) भाव को केंद्र भाव कहते है ।
केन्द्र भाव को सबसे शुभ माना जाता है और इस भाव को लक्ष्मी जी का भाव भी माना जाता है ।
केंद्र भाव हमारे जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्र को दायरे में लाता है जैसे प्रथम भाव जातक खुद होता है, आपका विचार, आपका स्वभाव, कद- काठी आदि का विचार होता है ।
चतुर्थ भाव आपके सुख, माता, भूमि-भवन-वाहन का भाव होता है ।
सप्तम भाव आपके वैवाहिक जीवन तथा दैनिक आमदनी का भाव होता है ।
और दशम भाव आपके कर्म एवं वयवसाय का भाव होता है ।
त्रिकोण भाव :- केंद्र(1) , पंचम(5) और नवमं(9) भाव त्रिकोण भाव कहलाते है । त्रिकोण भाव सबसे शुभ भाव कहा जाता है और इन भावों को विष्णु स्थान भी कहा जाता है । पंचम भाव का शुभ संबंध केंद्र से बनने पर राजयोग का निर्माण होता है।
केंद्र भाव हमारे जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्र को दायरे में लाता है जैसे प्रथम भाव जातक खुद होता है, आपका विचार, आपका स्वभाव, कद- काठी आदि का विचार होता है ।
पंचम भाव आपका शिक्षा का भाव, संतान एवं आपके कलात्मक शैली को बतलाता है।
नवमं भाव वो धर्म का भाव है , आपके पिता का भाव आदि ।
त्रिक भाव :- षष्टम (6), अष्टम(8) और द्वादश (12)भाव को त्रिक भाव के नाम से जाना जाता है । इस भाव को दुःस्थान कहा जाता है जीवन के संघर्ष, पीड़ा एवं बाधा को दरसत है ।
उपचय भाव :- तृतीय(3), षष्ठम(6),दशम(10) एवं एकादश(11) भाव को उपचय भाव कहते है ।ये भाव , भाव के कारकत्व में वृद्धि करता है ।एकादश(11) भाव को आय भाव भी कहा जाता है।
मारक भाव :- द्वितीय (2)भाव एवं सप्तम(7) भाव मारक भाव कहा जाता है । द्वितीय भाव को धन भाव भी कहते है ।
उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।
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