प्रिय पाठक,
नमस्कार।
मैं आचार्या सांत्वना दत्ता आज फिर से एक अच्छे विषय की जानकारी साझा करुँगी। आज इस पोस्ट में आप जानेंगे :-
अष्टमी और नवमीं तिथि के पावन और पवित्र दिन के बारे में सम्पूर्ण जानकारी।
नवरात्रि का सबसे शुभ दिन और पवित्र दिन आठवां दिन जिसको अष्टमी कहते है और नौवां दिन जिसको नवमीं कहते है । ये दोनों दिन नवरात्रि पवित्र पर्व और पावन दिन माना जाता है ।
बहुत लोग अपने व्रत का पारायण अष्टमी के दिन करते है और बहुत लोग नवमीं तिथि को ।पूजा पाठ समाप्त कर जातक छोटा सा हवन भी करते है जिसको अग्यारी कहते है और फिर कन्या का पूजन करते है ।
******आइये जानते है हवन आप कैसे बिना किसी पंडितजी की सहायता से कर सकते है।
अग्यारी क्या है ये जाने ? एक छोटी से हवन विधि ।
- रोज सम्पूर्ण पूजा होने के बाद छोटा सा हवनकुंड ले लें या मिट्टी का बड़ा कटोरा ।
- आप हवन में इस्तेमाल में होने वाली लकड़ी ले लीजिए या फिर आप उपले ले सकते है ।
- उसको प्रज्वलित कीजिये :- घी और कपूर डाल कर ।
- हवन सामग्री के साथ प्रत्येक सदस्य को अपने लिए 2 लौंग, 2 बतासे, और 2 इलाइची रखना है और माता के मंत्र बोल कर हवन करें।
माता का मंत्र है :-
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा
- आप 11 बार 21 बार कीजिये और फिर मंत्र उच्चारण करते हुए 2 लौंग, 2 इलाइची और बतासे भी हवन कुण्ड में समर्पित कीजिये ।
- ये विधि आप नवरात्रि में रोज कर सकते है या कम से कम अष्टमी और नवमीं तिथि को जरूर करें ।
- हवन कुंड को घर मे चारो तरफ घुमाए और फिर हवन कुंड को जहाँ रख कर प्रज्वलित किये थे वहां पर हवनकुंड के चारों ओर जल छिड़के ।
- ऐसा करने से प्रज्वलित अग्नि शांत होती है और साथ ही साथ हमारे घर मे यदि को नकारात्मक ऊर्जा है तो वो खत्म होती है ।
नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया अतः इन दोनों से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी आपको इस पोस्ट से प्राप्त होगा ।
जैसा कि आप जानते है 9 अप्रैल को अष्टमी और 10 तारीख को नवमीं मनाया जाएगा ।
बहुत से स्त्री और पुरूष नवरात्रि में व्रत करते है और व्रत का परायण अष्टमी या नवमी तिथि को करते है जो कि नवरात्रि का अंतिम दिन होता है ।
अष्टमी या नवमी के दिन सबस महत्वपूर्ण आयोजन कन्या पूजन का होता है इस दिन 5 वर्ष से 9 वर्ष की कन्याओं की पूजा की जाती है और मान्यता है जो भी छोटी कन्या होती है वो भगवती दुर्गा माँ स्वरूप होती है ।
आज की दिन व्रती भोग हलवा , पूरी और चने का तैयार करते है और प्रेम पूर्वक और स्नेह से कन्यायों का पूजा करते है और भोजन करवाते है ।
मान्यता है कि अष्टमी और नवमी तिथि को 1,3,5,7,8 या 9 कन्याओं को भोजन करवाना चाहिए और साथ ही साथ एक बालक जरूर होना चाहिए ।
इस पूजा को कन्या पूजा कंजक पूजा कहा जाता है । आप अपनी श्रद्धा और यथा शक्ति से कन्या को दान करें या तोहफ़े दे।
कन्या को भोजन करने के उपरांत पैसे और फल देने की परंपरा काफी सालो से चल रही है परंतु अब लोग गिफ्ट भी देते है ।
कन्या की उम्र कितनी होनी चाहिए ?
ऐसामाना जाता है की कन्या की उम्र 2 से 10 वर्ष तक ही होनी चाहिए इस उम्र तक कन्या देवी स्वरूप होती है। 2 वर्ष की कन्या को कुमारी , कन्या की उम्र 3 वर्ष है तो त्रिमूर्ति, यदि कन्या की उम्र 4 वर्ष है कल्याणी , यदि कन्या की उम्र 5 वर्ष है तो कन्या रोहिणी स्वरुप ,कन्या यदि 6 वर्ष तो कलिका , कन्या यदि 8 तो कन्या चंडिका ,कन्या यदि 8 वर्ष शांभवी और नौ बर्ष की कन्या को दुर्गा माना जाता है और 10 वर्ष की कन्या को सुभद्रा माना जाता है।
कन्या पूजन में कन्याओं की संख्या का क्या महत्व है ?
कन्या पूजन का महत्व बहुत है मान्यता है कि यदि आप अष्टमी और नवमी को कन्या का पूजन भक्ति पूर्वक करते है तो आपकी सभी प्रकार मनोकामना पूरी होती है। शास्त्रों में कन्या के संख्या के अनुसार फल बताया गया है :-
यदि आप एक(1 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :-आपको ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
यदि आप तीन (3 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :-आपको धर्म , काम और अर्थ की प्राप्ति होती है।
यदि आप पांच (5 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :-आपको विद्या की प्राप्ति होती है।
यदि आप एक(7 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :-आपको राज्य अधिकार की प्राप्ति होती है।
यदि आप एक(8 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :- आपको धन्य धान में वृद्धि होती है।
यदि आप एक(9 ) कन्या को आमंत्रित करते है तो :-आपको प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
कन्या की पूजन विधि क्या और कैसे करनी चाहिए ?
मुख़्य कन्या का पूजा सामन्यतः सुबह के समय में होता है ।
कन्यओ के लिए सात्विक रूप से भोजन तैयार किया जाता है ।
भोजन में हलवा ,पूरी और चना रूप से होता है ।
उसके बाद मातारानी के लिए प्रसाद तैयार होता है जिसे अठावरी कहते है इस प्रसाद में 8 पूरी एक साथ रखी जाती है और उस पर हलवा ,चना और कुछ पैसे भी रखे जाते है और इसका भोग मातारानी को लगाया जाता है और कन्याओं को भोजन कराने समय ये प्रसाद भी दिया जाता है।
कन्या का विधि पूर्वक पूजन से ही मातारानी का आशीर्वाद प्राप्त होता है आये जानते है कन्या पूजन कैसे करें :
- यथा शक्ति आपने जितनी कन्या को बुलाना है बुला लिजिये।
- सभी कन्याओं को उसके पैर जल से धोने होते है और फिर पैरो को पोछना भी चाहिए।
- उसके बाद हर कन्या आप रोली -कुमकुम -चन्दन ,अक्षत माथे पर लगाए।
- हाथ में मौली बंधे। कन्या को बहुत जगह आलता पैरों में भी लगते हैं।
- मातारानी की चुनरी भी उनके माथे पर बंधे।
- उसके बाद कन्या को हलवा -पूरी- चना पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ खिलते है।
- और साथ साथ प्रसाद जिसको अठावरी कहते है कन्याओं देना चाहिए।
- खिलने के बाद कन्याओं को एक फल और पैसा जरूर दे।
- कन्याओं और बालक को गिफ्ट या उपहार है तो अपने समर्थ अनुसार जरूर दे।
- उसके बाद आप सभी कन्या के पैर छुए। आज ये कन्या माता भगवती का ही रूप होती है अतः इनका आशीर्वाद फलस्वरूप आपके सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।
सभी कन्या और बालक को बिदा करने के बाद मातारानी का धन्यवाद जरूर दे और मातारानी हमें यह कर्म करने का मौका बार -बार दे यही प्रार्थना करें।
Happy Beginning...
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सबसे महत्वपूर्ण:-
1) रत्न के द्वारा उपाय
2) उपाय दान स्वरूप उन ग्रहों का जो आपके कुंडली के लये शुभ नही है।( *** कभी भी अच्छे ग्रह का दान नही करना चाहिए)
3) पूजा- पाठ उन ग्रहों का जो आपके लिए अच्छे तो परंतु आपके कुंडली मे कमजोर है ।
4) उपाय जो आपके जीवन में अनुकूल परिवर्तन लाये ।
5) कलर थेरपी, आचार- विचार या व्यवहार द्वारा, खान- पान द्वारा उपाय जाने ।
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