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मैं तो "कृष्ण" का भक्त हूं मैं "राधारानी" के नाम का जाप श्रीकृष्ण से पहले क्यों करूं ।

 मैं तो कृष्ण का भक्त हूं मैं राधा रानी के नाम का जाप श्रीकृष्ण से पहले क्यों करूं ।

प्रिय पाठक ,
नमस्कार ।
आओ एक कथा सुनाऊं श्री राधे कृष्ण की, नाम से एक अध्याय शुरू करने जा रही हूं । इस प्रकरण में कृष्ण और राधे कृष्ण से जुड़ी बहुत सारी कथा की विवेचना होगी और भक्ति का संगम भी और प्रेम का सार भी मिलेगा ।
जहां राधे -कृष्ण है वहां प्रेम और भक्ति दोनो का संगम है जो हमे आलौकिक ज्ञान प्रदान करता है ।



आए इस पोस्ट में एक कथा से जानेगें कि ये किसने कहा और फिर क्या हुआ था ।

एक बार ब्रह्मा जी ने कृष्ण भक्त श्रीधामा को ये उतरदायत्व दिया को वो गौधम जाकर कृष्ण को ये संदेश दे दे की उनका पृत्वी पर जन्म लेने का समय हो गया है । अपनी लीलाएं दिखाने का समय आ गया है ।
श्रीधमा और नारद मुनि गौधाम की तरफ चल पड़े । नारद मुनि ने श्रीधाम से कहा कि गौधाम आ गया है परंतु श्रीधाम ने देखा की चारों तरफ आकाश और सितारे थे तब नारद मुनि ने कहा यहां का द्वार "राधा नाम" का जाप से ही खुलता है ।

श्रीधामा को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नही मैं तो कृष्ण का भक्त हूं मैं अपने प्रभु से पहले राधा रानी का नाम क्यों लू ।

फिर क्या था नारद मुनि ने राधा रानी का नाम लिया और गौलोक के द्वार खुल गए ।
कृष्ण का दर्शन पाकर श्रीधामा बहुत खुश था परंतु अपने इष्ट को भी राधा रानी के प्रेम और प्रभाव में देख कर बहुत ही अशांत हो गया था ।

उसको लगने लगा था कि उसके प्रभु पर भी राधा रानी ने माया का जाल डाल कर रखा है ।
आरती और भोग का समय था श्रीधामा ने देखा की सब लोग "राधा-कृष्णा " का जाप कर रहे है।

वो भी अपने भगवान के लिए माखन से भरा घड़ा लेकर कृष्ण के पास पहुंचे । उन्होंने माखन कृष्ण को दिया परंतु कृष्ण ने माखन से भरा घड़ा राधारानी को दे दिया ।
राधारानी ने अपने हाथ में माखन लिए उससे चखा और कृष्ण को खिला दिया । ऐसा उन्होंने ( राधाजी )ने बार बार किया ।
इससे श्री धामा का गुस्सा चरम सीमा पर पहुंच गया उससे लगने लगा की राधा रानी ने अपना जूठन उसके भगवान कृष्ण को खिला दिया और कृष्ण तो उनके माया में भ्रमित है ।
श्री धामा ने वहां पर उपस्थित लोगो से कहा की आज वो साबित कर देगा की उसके भगवान " श्री कृष्णा " अधिक शक्तिशाली है "राधारानी" से ।

श्रीधामा सबलोग से कहा की "कृष्ण" शब्द का उच्चारण को । चारो तरफ "कृष्ण" नाम गुजायमान हो गया ।
  • उनके नाम मात्र से ही चारों तरफ हरियाली छा गई ।
  • चारों तरफ प्रकाश विद्यमान हो गया ।
  • पेड़ पौधे कलियां और फूल खिल गए मोनो ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सभी में जीवन प्रवेश कर गया हो ।
  • चिड़िया की चचाहट से पूरा वातावरण गूंज उठा ।
श्री धामा ने कहा देखा मैने कहा था मात्रा "कृष्ण" के नाम से ही सृष्टि प्रफुलित हो गई है ।

उससे देखा एक कीट पानी में तैर रहा था उसने कहा अब आप सभी इस कीट को ध्यान में रख कर राधा का नाम का जाप करें ।
सभी लोग उनके नाम का जाप किए वो कीट तुरंत ही भस्म हो गया ।

सभी लोग हैरान हो गए । फिर श्री धामा ने एक "तितली" को देख कर सभी लोगो से कहा अब आप इस तितली को देख कर राधा रानी का नाम जाप करें ।
जैसे ही लोगो ने उनके नाम का जाप किया फिर से वो तितली भी भस्म हो गई ।

फिर एक छोटी से बच्ची आई और वो श्रीधामा से कहने लगी की राधा रानी का नाम का जाप करो ना ।

श्री धामा अब कृष्ण के पैरो के पास आए और अपने भगवान से कहा की आपने अपने आंखों के सामने देखा न राधारानी के नाम मात्र से क्या हुआ ।
उससे कहा की प्रभू आप उनके माया के प्रभाव में है । राधा रानी को गौलोक में रहने का अधिकार नहीं है ।

कृष्ण ने उससे अपने हाथो से उठाया और कहा मुझे इतना बड़ा निर्णय लेने में थोड़ा समय लगेगा । कृष्ण ने कहा
अब मैं अपने निवास स्थान में जाता हूं क्या तुम मेरा द्वारपाल बनोगे और कहा की किसी को भी अंदर नहीं आने देना।
श्रीधाम खुश हो गया वो अपने भगवान की आज्ञा का पालन हर परिस्थिति में करेंगे ।
कृष्ण अपने विश्राम गृह में चले गए और द्वार को बंद कर दिया । श्री धामा द्वारपाल बन कर खड़े हो गए ।

भगवान कृष्ण ने "राधा" का नाम लिए । ऐसा कभी नही हुआ है की कान्हा राधा का नाम ले और राधे दौड़ी न आई हो ।
इस बार भी ऐसा ही हुआ कृष्ण ने राधा का नाम लिया और राधा कृष्ण से मिलने आ गई ।
परंतु द्वारपाल बन कर था श्रीधामा खड़े थे । राधा रानी के बार बार आग्रह करने पर भी श्रीधामा ने राधा रानी को अंदर जाने नही दिया ।

राधारानी को कृष्ण के बुलाने की आवाज आ रही थी वो कृष्ण बार-बार राधा रानी का नाम ले रहे थे ।

श्री धामा और राधा रानी के बीच उत्तर- प्रति उत्तर जारी था । श्री धामा किसी भी कीमत पर अनुमति नहीं दे रहे थे अंततः राधा रानी ने कहा की कृष्ण तो उनके स्मृति में बसे है और उनसे उनकी स्मृति कोई नही छीन सकता है ।
बस क्या था ये सुन श्रीधामा ने अपने इष्ट कृष्ण को साक्छी मान कर राधा रानी को श्राप दिया कि वो
कृष्ण को सौ साल तक भूली रहेंगी और गौलोक छोड़ कर मृत्युलोक में रहेंगी ।

श्री धामा के श्राप से सभी लोग स्तबद रह गए। कृष्ण भी अपने कक्ष से बाहर आ गए और वो लड़की फिर से श्रीधामा के पास आई और फिर कहने लगी की राधे -राधे कहो ना ।

श्रीधामा ने कहा इतना सब देखने के के बाद की उस कीट और तितली का क्या हाल हुआ राधा रानी के नाम के जाप से और फिर भी तुम चाहती हो कि राधा -रानी का नाम बोलूं ।

तब उस छोटी बच्ची ने कहा हां क्योंकि वो कीट मैं ही हूं और जब सब लोगो ने मुझे ध्यान में रख कर राधारानी का नाम लिया तो मैं कीट योनि से मुक्त हो गई और मैं रंगविरंगी तितली बन गई जो उड़ सकती है ।
फिर से मुझे ध्यान कर आप लोगो ने राधारानी के नाम का जाप किया तो मैं फिर से मुक्त होकर मानुष योनि में जन्म लिया जो चौरासी लाख योनियों के बाद मिलता है ।
मैं आपको फिर से राधारानी का जाप करने कह रही हो ताकि मुझे मोक्ष प्राप्त हो सके और मैं परमात्मा को प्राप्त कर सकूं।

ये बात श्रीधामा ने सुना तो उसके होश उड़ गए । उसको तब अपनी गलती का अहसास हुआ कि राधारानी के नाम लेने मात्र से मुक्ति मिलती है ।

वो अपने भगवान श्रीकृष्ण के पैरो पर गिरकर रोने लगे और अपने कृत के लिए माफी मांगने लगे । क्षमा याचना करने लगे ।
तब श्री कृष्ण ने कहा की ये सब पहले से ही तय था तुम तो सिर्फ निमित बने हो ।
श्री कृष्ण ने कहा कि याद करो तुम्हारा यहां आने को प्रयोजन क्या था ?
ब्रह्मा जी ने तुम्हे यहां क्यों भेजा था ।
तब श्री धामा को स्मरण हुआ की ब्रह्मा जी ने कहा था की वो श्री कृष्ण से कहे की
  • उनका धरती पर जन्म लेने का समय हो गया है ।
  • उनकी लीलाओं को दिखाने का समय हो गया है ।
  • दुनिया को सच्ची प्रीत सीखने का समय हो गया है ।
फिर सभी के साथ श्रीधामा ने भी राधारानी के नाम का जाप किया और वो छोटी से लड़की सभी के सामने मोक्ष को प्राप्त हुई ।

श्री कृष्ण का लीला दिखाने का समय तो हो गया था परंतु ये श्रीकृष्णा की ही इच्छा थी कि राधा रानी की स्मृति से निकल जाए क्योंकि उनको पता था इस धरती पर वो सिर्फ
  • प्रेम की भाषा नही सीखने आ रहे है वो तो ये भी सिखाएंगे
  • असत्य पर सत्य की विजय ।
  • वो सभी को धर्म शास्त्र सीखने आयेंगे ।
  • वो "गीता " के मध्यमा से जीवन जीना का तरीका समझेंगे ।

श्रीधामा ने कहा की वो राधारानी के माया में प्रभावित है वो क्या जाने जिसने सारे संसार को अपनी माया में ,अपने प्रेम में सम्मोहित कर रखा है वो खुद माया से प्रभावित कैसे हो सकता है ।

जिसके मिर्जी के बिन एक पत्ता भी नही हिलता वो खुद माया के प्रभाव में !! आश्चर्य में डालने वाले शब्द थे श्रीधामा के।

इस तरह राधा- रानी और श्रीकृष्ण का धरती पर आने की कथा की रचना हुई।

श्रीधामा की भक्ति शुद्ध थी । श्रीधामा अनंत भक्ति भाव से कृष्ण की भक्ति की परंतु उस भक्ति का कोई मोल नहीं यदि आप प्रेम की भाषा समझने में सक्षम ही न हो पाए ।
भक्ति और प्रेम का स्वरूप बहुत बृहत है और प्रेम और भक्ति दोनो ही सिक्के के एक ही पहलू है । दोनो एक दूसरे से के बिना अधूरे ।

राधे कृष्ण का प्रेम लोगों में निःस्वर्थ भाव से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त करता है । जितना आप राधे कृष्ण की भक्ति करते जायेंगे उतना ही उनके प्रेम में बंधते जायेगें । राधे -कृष्णा का प्रेम तो अमर-प्रेम है।

राधारानी के नाम का जाप श्रीकृष्ण से पहले इसलिए किया जाता है क्योंकि राधे के नाम मात्र लेने से ही मुक्ति मिलती है ।

वैसे भी सब तो हमारे श्रीकृष्णा ने ही तो रचा है अतः

फिर क्या है बोलते जाओ राधे कृष्ण , राधे कृष्ण , राधे कृष्ण!!

धन्यबाद।  



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