प्रिय पाठक ,
नमस्कार ।आज फिर से अच्छी बात होगी । आज फिर से श्री कृष्ण की बात होगी ।
हम सब ने महाभारत के युद्ध टीवी पर देखा है और हमने देखा की युद्ध के शुरू में शंखनाद होता है और जो शंख आपने श्री कृष्ण को बजाते हुए देखा वो शंख " पांचजन्य शंख " के नाम से जाना जाता है । इसके प्राप्ति में भी एक कथा है। और श्री कृष्ण के ये वचन सुदामा से क्यों कहा था "सुदामा तुम्हें चिड़वा का उधर चुकाना होगा " ??
मथुरा के राजा कंस को उसके पापों का उचित दंड देने के बाद और अपने नाना श्री राजा उग्रसेन को मथुरा की गद्दी सौंपने के बाद श्री कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम शिक्षा ग्रहण करने के लिए संदीपिनी मुनि के आश्रम गए जो काशी में था और जहां उन्होंने वेद , उपनिषदों और बहुत सारे ग्रंथों की शिक्षा ग्रहण की । उन्होंने धनुष विद्या , राजनीति आदि विषयों पर शिक्षा ग्रहण की और साथ ही साथ चौंसठ कलाओं में भी माहिर हुए ।
शिक्षा के दौरान ही इस आश्रम में श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता हुई थी ।
एक बार गुरु मां ने भोजन बनाने के लिए श्री कृष्ण और सुदामा को जंगल में से लकड़ी लेने भेजा । दोनो लकड़ी लेने चल दिए परंतु अभी वो थोड़ी दूर ही गए थे कि काले बादल से आसमान घिर गया और तेज की बारिश शुरू हो गई ।
दोनो एक बड़े से पेड़ पर चढ़ गए । सुदामा ऊपरी शाखा पर थे और श्री कृष्ण नीचे की ।
श्री कृष्ण ने कहा कि "उनको भूख लग रही थी " परंतु सुदामा ने कोई उत्तर नही दिया क्योंकि वो चिड़वा खाने में व्यस्त था जो गुरु मां ने जंगल जाते समय दोनो को खाने के लिए दिया था ।
श्री कृष्ण ने देखा और ऊपर सुदामा की शाखा पर आ गए और मजाक में कहा कि " तुम्हे मुझे ये चिड़वा बाद में देना होगा और ये उधार चुकाना होगा " ।
और जैसा आप सब जानते है कि जब श्री कृष्ण द्वारकाधीश हुए और गरीब सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण से मिलने पहुंचे तो वो अपने साथ चिड़वा लेकर गए थे और श्री कृष्ण ने बड़े प्यार से खाया था और इस तरह सुदामा को उधार चुकाना पड़ा था । हे कृष्ण :- दोस्ती कैसे निभाते है ये आप से सीखेंगे।
जब उनकी शिक्षा पूरी हो गई थी पहले गुरु दीक्षिणा की प्रथा थी तो उनके गुरु सांदीपनि ने अपने पुत्र को जीवित करने को कहा जिसकी मृत्यु कुछ साल पहले प्रभास सागर में डूबने से हो गई थी ।
श्री कृष्ण और भैया बलराम दोनो गुरु दक्षिणा देने हेतु सबसे पहले प्रभास सागर पहुंचे और उन्होंने सागर को आदेश दिया की वो मुनि संदीपिनि के पुत्र को वापस कर दे परंतु सागर ने कहा की मुनि के पुत्र उनके पास नही है वो तो शंख नमक राक्षस ले गया और जो पांचजन्य नामक पवित्र शंख के भीतर रहता है ।
श्री कृष्ण और भैया बलराम समुंद्र के अंदर गए और उन्होंने राक्षस शंख का वध किया परंतु वहां भी उनको मुनि के पुत्र नही मिले ।
हां यहां पर ही श्री कृष्ण को पांचजन्य शंख की प्राप्ति हुई और वो शंख लेकर यमपुरी पहुंच गए और यमपुरी के सामने उन्होंने ये शंख बजाया ।
यमराज श्री कृष्ण के स्वागत के लिए निकले । उन्होंने अपने आने का कारण बताया । यमराज तुरंत तैयार हो गए और उन्होंने मुनि संदीपिन के पुत्र को लौटा दिया ।
श्री कृष्ण और भैया बलराम मुनि के पुत्र को लेकर पहुंचे , गुरु अपने पुत्र को देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए और इस तरह से श्री कृष्ण और बलराम अपनी गुरु दक्षिणा देकर मथुरा वापस आ गए ।
तब से ही श्री कृष्ण के साथ ये पांचजन्य शंख रहा और इस तरह से श्री कृष्ण को ये पवित्र शंख प्राप्त हुआ ।
फिर से एक ऐसा अद्भुत कार्य जो श्री कृष्ण ने किया जीवन दान देने का ।
आश्रम में दोनो एक आज्ञाकारी बालक की तरह शिक्षा ग्रहण किए और गुरु दक्षिणा में उनसे वो मांगा गया जो सिर्फ के ईश्वर ही दे सकते है ।
श्री कृष्ण की लीला अद्भुत है जितना इनके बारे में जानते जायेगें उतना ही आनंद की अनुभूति होती जायेगी ।
इस आनंदमय ईश्वर की भक्ति करते जाइए और उनका नाम जपते जाए राधे कृष्ण, राधे कृष्ण, राधे कृष्ण।
उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।
धन्यवाद
Happy Beginning...
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