प्रिय पाठक,
नमस्कार।मैं आचार्या सांत्वना दत्ता आज फिर से एक अच्छे विषय की जानकारी साझा करुँगी।
आज इस पोस्ट में आप प्रत्येक (12) भाव के स्थिर कारक ग्रह ( Sthir Karaak garh) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे । इस पोस्ट में
जैसा को हम जानते है कि कुंडली को 12 भागो में बांटा गया है । प्रत्येक भाव के स्थिर कारक ग्रह होते है । कारक ग्रह को आप मकान मालिक की तरह समझ सकते है और कुंडली विश्लेषण( Kundali Vishleshan ) में स्थिर कारक ग्रह की स्तिथि को जानना महत्वपूर्ण होता है।
हर जातक की कुंडली मे 12 भावो में अलग -अलग राशि होती है और ग्रह की स्थिति भी अलग होती है परंतु सभी जातक के कुंडली में 12 भावो के स्थिर कारक(Sthir Karaak garh) एक ही होंगे जैसे
प्रथम भाव :- सूर्य देव:- प्रथम भाव का स्थिर करक सूर्य माना गया है। जैसा हम जानते है कि प्रथम भाव से जातक का स्वास्थ भी देकते है अब यदि कुंडली में सूर्य देव की उपस्थिति अच्छी न या वो पीड़ित हो मतलब 6,8,12 भाव में हो तो जातक अस्वस्थ रहना का एक कारण ये ही होगा।
द्वतीय भाव :- बृहस्पति देव:- द्वतीय भाव धन का कारक है और देव गुरु बृहस्पति कारक इस भाव के है और यदि कुंडली में द्वतीये भाव में इनकी उपस्थिति हो तो जातक की कुंडली में धन की स्थति अच्छी रहेगी।
तृतीय भाव :- मंगल देव :- मगल को पराक्रम और साहस का कारक है और तृतीये भाव भी पराक्रम का भाव है यदि हमें जातक के बाहुबल व् स्वपराक्रम को देखना है तो हमें कुंडली में मंगल की स्थिति को देखना आवश्यक होता है।
चतुर्थ भाव :- चंद्र देव :- चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है और चन्द्रमा से माता का भी विचार किया जाता हैऔर चतुर्थ भाव से सुख का विचार भी होता है अतः चन्द्रमा यदि अपने भाव में बैठा हो या अपने भाव को देख रहा हो या अच्छा हो तो चतुर्थ भाव से जुड़े कारकत्व में वृद्धि होगी।
पंचम भाव :- बृहस्पति देव :- पंचम भाव को संतान का सुख भाव भी कहा जाता है यदि देव गुरु बृहस्पति को संतान सुख का कारक कहा गया है अतः. संतान से जुड़े की भी प्रश्न के जबाब के लिए देव गुरु बृहस्पति की स्थति का विचार जरूर करना चाहिए।
षष्ठम भाव :- शनि देव और मंगल देव :- षष्ठम भाव को शनि देव और मंगल देव स्थिर कारक ग्रह है। शनि देव को नौकरी का कारक माना गया है और छटे भाव से नौकरी देखे जाता है और मंगल को प्रतिस्पर्धा व् कॉम्पिटिशन का कारक , लड़ने -भिड़ने को तैयार ,अत्यधिक पराक्रम का कारक और छठा भाव शत्रु भाव भी माना जाता है अतः मंगल और शनि दोनों को ये भाव का स्थिर कारक मन गया है।
सप्तम भाव :- शुक देव:- सप्तम भाव वैवाहिक सुख का स्थान है , विलाशिता का स्थान है , वैभव पूर्ण जीवन का स्थान है और शुक्र देव इन सब के कारक है। आपके जीवन में वैवाहिक सुख कैसा रहेगा उसके लिए शुक्र देव की स्थिति देखनी जरुरी होती है।
अष्टम भाव :- शनि देव :- अष्टम भाव आयु व् मृत्यु का भाव है और शनि हर चीज में देरी( delay ) का कारण बनते है। अब यदि शनि देव अष्टम भाव में ही विराजमान है तो मृत्यु को आने में देरी करेंगे इसका निष्कर्ष ये हुआ की आपकी आयु बढ़ जाएगी।
नवमं भाव:- बृहस्पति देव और सूर्य देव :- देव गुरु बृहस्पति देवताओ के गुरु है। धर्म के रक्षक है और नवम भाव को धर्म का कहा जाता है और आपकी धार्मिक प्रवृति का स्थान है। देव गुरु बृहस्पति का नवम भाव होना या नवम भाव को देखना व् कुंडली में अच्छा होने , हमारे धार्मिक प्रवृति को बतलाता है। नवम भाव पिता का कारक भी है और सूर्य देव भी पिता के कारक है अतः उन्हें भी नवम भाव का स्थिर कारक माना गया गया है।
दशम भाव :- सूर्यदेव , बुधदेव , बृहस्पतिदेव , शनिदेव :-दशम भाव कर्म है। आपके यश -मान प्रतिष्ठा का भाव है।आपके व्यवसाय का भाव है।
- सूर्य देव को यश -मान प्रतिष्ठा के कारक है। सूर्य देव की अच्छी उपस्थिति से जातक को राज्यसुख की प्राप्ति होती है।
- बुध देव को व्यवसाय का करक माना गया है और उनको बनया ग्रह भी कहा जाता है। अतः व्यवसाय के लिए दशम भाव बुध देव के लिए स्थिर करक भाव है। यदि किसी की कुंडली में बुध देव अच्छे है और यदि दशम भाव में है तो जातक अच्छा व्यपारी होगा।
- शनि देव को नौकरी व् व्यवसाय का कारक माना गया है यदि शनि कुंडली में अच्छी स्थिति में है तो जातक का नौकरी और व्यवसाय अच्छा चलेगा।
- देव गुरु बृहस्पति को भी इस भाव स्थिर करक भाव माना गया है।
एकादश भाव :- बृहस्पति देव:- एकादश भाव आय का भाव है। एकादश भाव हमने जो कर्म किये है उसकी वृद्धि को बतलाता है यह हमारे कर्म का संग्रह भाव है और इस भाव के भी देव गुरु बृहस्पति करक है।
द्वादश भाव :- शनि देव:- ये भाव हर तरह के फिजूल का खर्च माना जाया है चाहे वो शरीर का हो , या मानसिक हो या फिर धन का। शनि को पापी ग्रह माना गया है उनको दुःख का करक माना अतः शनि को इस भाव का कारकत्व प्राप्त है।
उम्मीद है आपको ये जानकारी अच्छी लगी होगी।
धन्यवाद
Happy Beginning...
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सबसे महत्वपूर्ण:-
1) रत्न के द्वारा उपाय
2) उपाय दान स्वरूप उन ग्रहों का जो आपके कुंडली के लये शुभ नही है।( *** कभी भी अच्छे ग्रह का दान नही करना चाहिए)
3) पूजा- पाठ उन ग्रहों का जो आपके लिए अच्छे तो परंतु आपके कुंडली मे कमजोर है ।
4) उपाय जो आपके जीवन में अनुकूल परिवर्तन लाये ।
5) कलर थेरपी, आचार- विचार या व्यवहार द्वारा, खान- पान द्वारा उपाय जाने ।
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